AN INSIGHT INTO DEPRESSION AS A DISORDER: in Hindi
डिप्रेशन को एक विकार या रोग के तौर पर पहले इसे समझने की ज़रूरत है।
मनुष्य में आमतौर पर अपनी सभी भावनाओं को व्यक्त करने की प्रवृत्ति होती है जो कि प्राकृतिक होती है, मसलन वह क्रोधित भी होता है, घबराता भी है, खुश भी होता है, चिड़चिड़ाता भी है और उदास भी होता है। ये भावनायें हम सब मन में चलने वाले उस क्षण के भाव पर आधारित होते हैं या हमारी ज़िंदगी घटित होने वाली घटनाओं/ वाकयों पर आधारित सामान्य प्रतिक्रिया होती है।
हम सबके जीवन में सामान्यतः हर प्रकार के वाक़ये होते हैं, उदासीनता वाले भी होते हैं। इन वाकयों पर संबंधित भावनात्मक प्रतिक्रिया देना बिल्कुल सामान्य होता है और जल्दी ही हम उस परिस्तिथि से ढल जाते हैं और लंबे समय तक वो भावनायें बनी नही रहती है। उदासीनता के बारे में इसे हम NORMAL SADNESS कह सकते हैं। ऐसी उथल पुथल का हम किसी न किसी से संवाद भी करते हैं अमूमन उनसे जो हमारे दिल के करीब होता है और इनसे बाहर निकलने के लिए व्यवहारिक उपाय भी करते हैं।
तो अब सवाल उठता है कि DEPRESSION को एक DISORDER की तरह हम कैसे समझें?
मनोचिकित्सीय संवाद में DEPRESSION को दो रूप में देखा जाता है: REACTIVE और ENDOGENOUS। लेकिन INTERNATIONAL CLASSIFICATION OF DISEASES 10 (A book of WHO) इसके निदान के नजरिए को अलग नहीं मानती है, वह दोनों को एक ही रूप में देखती है।
REACTIVE DEPRESSION वह होता है जिसमें DEPRESSIVE DISORDER होने के TRIGGER होते हैं जैसे कि जीवन में आई किसी प्रकार की समस्या, जहां से इसकी शुरुआत होती है।
ENDOGENOUS DEPRESSION वह होता है जिसमें मूलभूत ऐसी कोई जीवन की समस्या या तनाव देखने को नही मिलता है।
फिर सवाल उठता की DEPRESSION क्यों हो जाता है और ये NORMAL SADNESS से कैसे अलग है। कई अलग अलग शोधों में यह देखा गया है कि डिप्रेशन होने के BIOLOGICAL आधार होते हैं यानी कि दिमाग में होने वाले असामान्य रासायनिक बदलाव। जिसमे सबसे प्रखर SEROTONIN नामक NEURO-TRANSMITTER (एक रासायन) की भूमिका देखी गई है, डिप्रेशन में इस रसायन की गतिविधियां दिमाग में कम हो जाती हैं। ये बात इस बात से भी पुख्ता होती है कि डिप्रेशन के मरीजों में इस रसायन की गतिविधि को बढ़ाने वाली ANTI-DEPRESSANT दवाइयां दी जाती हैं, जिनमें से एक दवाइयों के समूह को SELECTIVE SEROTONIN REUPTAKE INHIBITORs कहा जाता है, तो डिप्रेशन ठीक होने लगता है और नकारात्मक सोच धीमी पड़ने लगती है।
DEPRESSIVE DISORDER को कैसे पहचाना जाये?
अवसाद के लक्षणों में शामिल हैं:
(अवसाद के निदान के लिए बताये गए लक्षणों में से ज्यादातर का साथ होना आवश्यक है। अन्यथा इनमें से एक या कम लक्षण हम सामान्य रूप में रोज़मर्रा में महसूस कर सकते है।)
• प्राय: हर रोज, दिन के ज्यादातर समय, उदास महसूस करना,
• जिन कार्यकलापों में पहले आपका मन लगता था उनमें रुचि खत्म या कम हो जाना,
• ताकत की कमी महसूस होना: परन्तु शारीरिक तौर पर किसी बिमारी का न होना,
• सोने की आदतों में बदलाव: जैसे कम नींद, ज्यादा नींद, नींद आने में समय लगना बार बार नींद का टूटना circadian reversal रात कि बजाय दिन में नींद आना,
• भूख में परिवर्तन: कम या ज्यादा लगना भूख रहते हुए भी खाने कि इच्छा ना,
• यौन इच्छा में बदलाव,
• हताशा, बेबसी, तुच्छता या अपराध-बोध जैसी भावना (hopelessness, helplessness, worthlessness और guilt feelings,
• ध्यान केन्द्रित करने या निर्णय लेने में सक्षम न होना (impaired concentration presented as memory problem,
• ज्यादा चिड़चिड़ापन या क्रोध,
• स्पष्ट कारण के बिना ही ज्यादा चिंता या घबराहट महसूस होना,
• मृत्यु या आत्महत्या के विचार आना,
यदि आप कम से कम दो हफ्तों के लिए उपरोक्त में से किन्हीं भी लक्षणों का दिन के ज्यादातर समय अनुभव करते/करती हैं तो संभव है कि आप अवसाद से ग्रस्त हों।}
DEPRESSION की तीव्रता के अनुसार DEPRESSIVE DISORDER को तीन वर्गों में बांटा गया है: MILD, MODERATE AND SEVERE. डिप्रेशन के SEVERE होने पर खुद को नुकसान पहुंचाने प्रवृत्ति काफी बढ़ जाती है और इसी समय तार्किक सोच समझ और सूझबूझ पर मरीज़ का उतना नियंत्रण नही रहता है। इस स्तिथि पर ये कहना कि वो एक बार किसी से बात कर लेता ऐसा बेमानी होगा क्योंकि दिमाग में SEROTONIN की कमी विकराल हो गयी है और POSITIVITY के खयाल नगण्य हो गए हैं। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि यदि ये मरीज़ खुद को नुकसान पहुचाने का कदम उठाता है तो ये डिप्रेशन करवा रहा है अब ये उसके VOLUNTARY CONTROL में नहीं है।
लेकिन आत्महत्या के विचार और उस पर क्रिया अनायास ही पैदा होने वाली स्थिति नहीं होती है, इसमें काफी समय लगता है और मरीज़ के जेहन में इससे पहले काफी जद्दोजहद चलती है, जिसे पहचाना जा सकता है।
अब सवाल उठता है कि यदि ये मरीज़ के VOLUNTARY CONTROL में नहीं है और वह किसी से DISCUSS नहीं करेगा तो दूसरे लोग इस TENDENCY को कैसे भांप सकते हैं?
इसको मैं तीन भागों में बांटकर समझाना चाहूंगा: 1. व्यक्ति दिखेगा कैसा 2. व्यवहार कैसा होगा 3. बोलचाल कैसी होगी। मतलब ये इशारे होंगे जो डिप्रेशन से ग्रसित व्यक्ति देगा।
1. व्यक्ति का चेहरे में अन्य भावों की कमी दिखेगी, चेहरा उदासीन दिखेगा, चेहरे की मांसपेशियां tense दिखेंगी, माथे पर बल पड़े दिखाई देंगे, मुंह के angles झुके हुए होंगे (उदासी वाली emoji को देख कर समझा जा सकता है)। नज़रों की दिशा नीचे की तरफ झुकी हुई होगी, वह नज़रे बहुत कम मिलाएगा (low confidence के कारण)। कमर धनुष की तरह आगे झुकी हुई होगी। शरीर के movements काफी कम होंगे। आवाज धीमी और तल्ख होगी। बातचीत करने पर वो रुआंसा या रो भी पड़ सकता है।
2. अकेला रहना ज्यादा पसंद करेगा। बातचीत कुछ अल्फाजों में ही करेगा। ज्यादा कुरेदने पर झल्ला भी सकता है। कुछ ऐसे सामानों की ख़रीदारी कर सकता है जिसका इस्तेमाल वह खुद को नुकसान पहुंचाने के लिए कर सकता है।
3. बोलचाल में वो कुछ इस तरह के वाक्यों का प्रयोग करता हुआ नजर आएगा: सब कुछ बेकार है, कुछ भी ठीक नहीं है, कोई किसी का नहीं है, इस बात का क्या फायदा, ऐसा करने से क्या मिलेगा, वहां जाकर क्या करोगे, जिंदगी व्यर्थ है, धरती पर इंसान हैं ही क्यों जब सबको मरना है, इससे अच्छा तो भगवान बुला ले, इससे तो मर जाना अच्छा है, मैं बेकार हूँ, जीने का कोई मतलब नहीं है इत्यादि। वह मरने के उपाय का भी जिक्र कर सकता है।
मुझे आशा है कि लेख से यह समझने को मिलेगा कि खुद को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति रखने वाले डिप्रेशन के मरीजों को दोष देने की बजाय लोग समझेंगे कि DEPRESSION किस तरह द्वंद करता है और दिमागी तौर पर मरीज़ का इस पर पूर्णरूपेण नियंत्रण नहीं होता है। इससे वक़्त रहते आसपास के लोग इस प्रवृत्ति को भांप कर चिकित्सीय सलाह के अग्रसर होंगे।
उदासी vs अवसाद - keep in mind।
*PLEASE SHARE IN BENEFIT OF THE SOCIETY*

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